श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 13: सीताजी के नाश की आशंका से हनुमान्जी की चिन्ता, श्रीराम को सीता के न मिलने की सचना देने से अनर्थ की सम्भावना देख हनुमान का पुनः खोजने का विचार करना  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  5.13.7 
क्षिप्रमुत्पततो मन्ये सीतामादाय रक्षस:।
बिभ्यतो रामबाणानामन्तरा पतिता भवेत्॥ ७॥
 
 
अनुवाद
मैं सोचता हूँ कि जब वह राक्षस श्री रामजी के बाणों से भयभीत होकर सीताजी को लेकर शीघ्रता से आकाश में कूदा होगा, तब वह मुक्त होकर बीच में कहीं गिर पड़ी होगी॥ 7॥
 
I think that when that demon, frightened by Sri Rama's arrows, quickly jumped into the sky carrying Sita, she might have got freed and fallen somewhere in the middle.॥ 7॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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