श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 13: सीताजी के नाश की आशंका से हनुमान्जी की चिन्ता, श्रीराम को सीता के न मिलने की सचना देने से अनर्थ की सम्भावना देख हनुमान का पुनः खोजने का विचार करना  »  श्लोक 65
 
 
श्लोक  5.13.65 
ब्रह्मा स्वयम्भूर्भगवान् देवाश्चैव तपस्विन:।
सिद्धिमग्निश्च वायुश्च पुरुहूतश्च वज्रभृत्॥ ६५॥
 
 
अनुवाद
स्वयंभू ब्रह्माजी, अन्य देवता, तपस्वी महर्षि, अग्निदेव, वायुदेव और वज्रधारी इन्द्र भी मुझे सिद्धि प्रदान करें॥65॥
 
May the self-empowered Lord Brahma, other gods, the ascetic Maharishi, the fire god, Vayu and the thunderbolt-wielding Indra also grant me success. 65॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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