श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 13: सीताजी के नाश की आशंका से हनुमान्जी की चिन्ता, श्रीराम को सीता के न मिलने की सचना देने से अनर्थ की सम्भावना देख हनुमान का पुनः खोजने का विचार करना  »  श्लोक 54
 
 
श्लोक  5.13.54 
इहैव नियताहारो वत्स्यामि नियतेन्द्रिय:।
न मत्कृते विनश्येयु: सर्वे ते नरवानरा:॥ ५४॥
 
 
अनुवाद
अतः मैं यहाँ नियमित आहार और इन्द्रियों का संयम करके निवास करूँगा। वे सभी मनुष्य और वानर मेरे कारण नष्ट न हों ॥54॥
 
‘Therefore I will reside here with a regular diet and with restraint on the senses. May all those men and monkeys not perish because of me. ॥ 54॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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