श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 13: सीताजी के नाश की आशंका से हनुमान्जी की चिन्ता, श्रीराम को सीता के न मिलने की सचना देने से अनर्थ की सम्भावना देख हनुमान का पुनः खोजने का विचार करना  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  5.13.50 
अथवैनं समुत्क्षिप्य उपर्युपरि सागरम्।
रामायोपहरिष्यामि पशुं पशुपतेरिव॥ ५०॥
 
 
अनुवाद
अथवा मैं इसे उठाकर समुद्र के पार ले जाकर श्री रामजी को सौंप दूँगा, जैसे पशु को पशुपति (रुद्र या अग्नि) को अर्पित किया जाता है।॥50॥
 
‘Or I shall pick it up and carry it across the ocean and hand it over to Sri Rama, just as an animal is offered to Pashupati (Rudra or Agni).’॥ 50॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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