श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 13: सीताजी के नाश की आशंका से हनुमान्जी की चिन्ता, श्रीराम को सीता के न मिलने की सचना देने से अनर्थ की सम्भावना देख हनुमान का पुनः खोजने का विचार करना  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  5.13.47 
विनाशे बहवो दोषा जीवन् प्राप्नोति भद्रकम्।
तस्मात् प्राणान् धरिष्यामि ध्रुवो जीवति संगम:॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
इस जीवन को नष्ट करने में अनेक दोष हैं। जो मनुष्य जीवित रहता है, वह किसी न किसी दिन अवश्य ही धन्य हो जाता है; इसलिए मैं इन जीवनों को धारण करूँगा। यदि जीवित रहता है, तो इच्छित वस्तु या सुख की प्राप्ति अवश्यंभावी है।॥47॥
 
‘There are many faults in destroying this life. The man who remains alive, some day or the other, is sure to be blessed; therefore I shall hold on to these lives. If one remains alive, attainment of the desired object or happiness is inevitable.’॥ 47॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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