श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 13: सीताजी के नाश की आशंका से हनुमान्जी की चिन्ता, श्रीराम को सीता के न मिलने की सचना देने से अनर्थ की सम्भावना देख हनुमान का पुनः खोजने का विचार करना  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  5.13.45 
तापसो वा भविष्यामि नियतो वृक्षमूलिक:।
नेत: प्रतिगमिष्यामि तामदृष्ट्वासितेक्षणाम्॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
'या फिर मैं नियमानुसार वृक्ष के नीचे तपस्वी हो जाऊँगा; किन्तु उस असितलोचना सीता को देखे बिना यहाँ से कभी नहीं लौटूँगा ॥ 45॥
 
‘Or else I will become an ascetic living under a tree as per the rules; but I will never return from here without seeing that Asitalochana Sita.॥ 45॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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