श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 13: सीताजी के नाश की आशंका से हनुमान्जी की चिन्ता, श्रीराम को सीता के न मिलने की सचना देने से अनर्थ की सम्भावना देख हनुमान का पुनः खोजने का विचार करना  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  5.13.43 
इदमप्यृषिभिर्दृष्टं निर्याणमिति मे मति:।
सम्यगाप: प्रवेक्ष्यामि न चेत् पश्यामि जानकीम्॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
यदि मुझे जानकीजी के दर्शन न हों, तो मैं प्रसन्नतापूर्वक जल-समाधि ले लूँगा। मेरे विचार से जल में प्रवेश करके परलोक जाने का यह मार्ग मुनियों की दृष्टि में भी श्रेष्ठ है॥ 43॥
 
‘If I do not get to see Janaki, I will happily take jal-samadhi. In my opinion, this way of entering water and going to the other world is the best even in the eyes of sages.॥ 43॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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