श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 13: सीताजी के नाश की आशंका से हनुमान्जी की चिन्ता, श्रीराम को सीता के न मिलने की सचना देने से अनर्थ की सम्भावना देख हनुमान का पुनः खोजने का विचार करना  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  5.13.41 
सागरानूपजे देशे बहुमूलफलोदके।
चितिं कृत्वा प्रवेक्ष्यामि समिद्धमरणीसुतम्॥ ४१॥
 
 
अनुवाद
अथवा समुद्र के किनारे किसी स्थान पर, जहाँ फल, मूल और जल प्रचुर मात्रा में हों, चिता बनाकर जलती हुई अग्नि में प्रवेश करूँ॥ 41॥
 
‘Or at a place near the seashore, where there is abundance of fruits, roots and water, I shall make a pyre and enter the burning fire.॥ 41॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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