श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 13: सीताजी के नाश की आशंका से हनुमान्जी की चिन्ता, श्रीराम को सीता के न मिलने की सचना देने से अनर्थ की सम्भावना देख हनुमान का पुनः खोजने का विचार करना  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  5.13.34 
न वनेषु न शैलेषु न निरोधेषु वा पुन:।
क्रीडामनुभविष्यन्ति समेत्य कपिकुञ्जरा:॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
ऐसी स्थिति में शेष बचे हुए वानर कभी भी वन, पर्वत और गुफाओं में एकत्रित होकर एक साथ क्रीड़ा का आनन्द नहीं लेंगे॥ 34॥
 
‘In such a condition the remaining monkeys will never again gather in the forests, mountains and caves and enjoy playing together.॥ 34॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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