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श्लोक 5.13.20  |
यदि सीतामदृष्ट्वाहं वानरेन्द्रपुरीमित:।
गमिष्यामि तत: को मे पुरुषार्थो भविष्यति॥ २०॥ |
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| अनुवाद |
| (उसने फिर सोचा-) 'यदि मैं सीताजी के दर्शन किए बिना ही यहाँ से वानरराज के धाम किष्किन्धा को लौट जाऊँ, तो मेरे प्रयत्न का क्या अर्थ होगा?॥ 20॥ |
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| (He thought again -) 'If I return from here to Kishkinda, the abode of the monkey king, without seeing Sitaji, then what will be the point of my endeavor?॥ 20॥ |
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