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श्लोक 5.13.2  |
सम्परिक्रम्य हनुमान् रावणस्य निवेशनान्।
अदृष्ट्वा जानकीं सीतामब्रवीद् वचनं कपि:॥ २॥ |
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| अनुवाद |
| पुनः रावण के सब घरों की परिक्रमा करने के पश्चात् जब महाबली हनुमान्जी को जनकननदिनी सीताजी का दर्शन नहीं हुआ, तब वे मन ही मन इस प्रकार कहने लगे -॥2॥ |
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| After going round all the houses of Ravana once again, when the great monkey Hanuman did not see Janakanandini Sita, he began to say thus to himself -॥2॥ |
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