श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 10: हनुमान जी का अन्तःपुर में सोये हुए रावण तथा गाढ़ निद्रा में पड़ी हुई उसकी स्त्रियों को देखना तथा मन्दोदरी को सीता समझकर प्रसन्न होना  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  5.10.40 
काचिद् वीणां परिष्वज्य सुप्ता कमललोचना।
वरं प्रियतमं गृह्य सकामेव हि कामिनी॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
कमल के समान नेत्रों वाली एक युवती वीणा का आलिंगन करती हुई सो रही थी, मानो कोई कामातुर स्त्री अपने प्रियतम को गोद में लेकर सो गई हो ॥40॥
 
A young girl with lotus eyes seemed to be sleeping embracing Veena, as if a woman overcome with passion had fallen asleep with her beloved in her arms. ॥ 40॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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