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श्लोक 5.10.37  |
काचिद् वीणां परिष्वज्य प्रसुप्ता सम्प्रकाशते।
महानदीप्रकीर्णेव नलिनी पोतमाश्रिता॥ ३७॥ |
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| अनुवाद |
| वक्षस्थल से वीणा दबाए सोती हुई सुन्दरी ऐसी लग रही थी मानो नदी में पड़ा हुआ कमल किसी नाव में अटक गया हो। 37. |
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| A beautiful lady sleeping with a Veena pressed to her chest looked as if a lotus lying in the great river had got stuck to a boat. 37. |
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