श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 10: हनुमान जी का अन्तःपुर में सोये हुए रावण तथा गाढ़ निद्रा में पड़ी हुई उसकी स्त्रियों को देखना तथा मन्दोदरी को सीता समझकर प्रसन्न होना  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  5.10.34 
तासां चन्द्रोपमैर्वक्त्रै: शुभैर्ललितकुण्डलै:।
विरराज विमानं तन्नभस्तारागणैरिव॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
सुन्दर कुण्डलों से सुशोभित तथा चन्द्रमा के समान सुन्दर मुखों से युक्त वह विमानाकार आकाश तारों से जड़ित आकाश के समान शोभायमान हो रहा था॥34॥
 
Decorated with fine earrings and with their beautiful faces as beautiful as the moon, that plane-shaped sky was becoming beautiful like the sky studded with stars. 34॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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