श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 10: हनुमान जी का अन्तःपुर में सोये हुए रावण तथा गाढ़ निद्रा में पड़ी हुई उसकी स्त्रियों को देखना तथा मन्दोदरी को सीता समझकर प्रसन्न होना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  5.10.17 
पीनौ समसुजातांसौ संगतौ बलसंयुतौ।
सुलक्षणनखांगुष्ठौ स्वंगुलीयकलक्षितौ॥ १७॥
 
 
अनुवाद
वे भुजाएँ चारों ओर से समान थीं, सुन्दर कन्धों वाली थीं, मोटी थीं, उनके जोड़ मजबूत थे, वे सुदृढ़ एवं सुडौल नखों और अँगूठों से सुशोभित थीं, उनकी उँगलियाँ और हथेलियाँ अत्यंत सुन्दर लग रही थीं॥17॥
 
Those arms were equal on all sides and had beautiful shoulders and were thick. Their joints were strong. They were adorned with strong and well-shaped nails and thumbs. Their fingers and palms looked very beautiful.॥ 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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