श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 10: हनुमान जी का अन्तःपुर में सोये हुए रावण तथा गाढ़ निद्रा में पड़ी हुई उसकी स्त्रियों को देखना तथा मन्दोदरी को सीता समझकर प्रसन्न होना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  5.10.14 
शुशुभे राक्षसेन्द्रस्य स्वपत: शयनं शुभम्।
गन्धहस्तिनि संविष्टे यथा प्रस्रवणं महत्॥ १४॥
 
 
अनुवाद
जब राक्षसराज रावण सो रहा था, तब वह सुन्दर शय्या ऐसी सुन्दर प्रतीत हो रही थी, जैसे गंधहस्ती के सो जाने पर विशाल प्रस्रवण पर्वत सुन्दर प्रतीत होता था ॥14॥
 
When the king of demons Ravana was sleeping, that beautiful bed looked as beautiful as the huge Prasravana mountain looked beautiful when a Gandha Hasti slept. ॥ 14॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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