|
| |
| |
श्लोक 5.10.14  |
शुशुभे राक्षसेन्द्रस्य स्वपत: शयनं शुभम्।
गन्धहस्तिनि संविष्टे यथा प्रस्रवणं महत्॥ १४॥ |
| |
| |
| अनुवाद |
| जब राक्षसराज रावण सो रहा था, तब वह सुन्दर शय्या ऐसी सुन्दर प्रतीत हो रही थी, जैसे गंधहस्ती के सो जाने पर विशाल प्रस्रवण पर्वत सुन्दर प्रतीत होता था ॥14॥ |
| |
| When the king of demons Ravana was sleeping, that beautiful bed looked as beautiful as the huge Prasravana mountain looked beautiful when a Gandha Hasti slept. ॥ 14॥ |
| ✨ ai-generated |
| |
|