श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 1: हनुमान् जी के द्वारा समुद्र का लङ्घन, मैनाक के द्वारा उनका स्वागत, सुरसा पर उनकी विजय तथा सिंहिका का वध,लंका की शोभा देखना  »  श्लोक 75
 
 
श्लोक  5.1.75 
क्रममाणं समीक्ष्याथ भुजगा: सागरंगमा:।
व्योम्नि तं कपिशार्दूलं सुपर्णमिव मेनिरे॥ ७५॥
 
 
अनुवाद
वानरों में श्रेष्ठ हनुमान् को आकाश में जाते देखकर समुद्र में विचरण करने वाले नाग उन्हें गरुड़ के समान समझने लगे। 75.
 
The serpents roaming in the ocean, on seeing Hanuman, the best of the apes going into the sky, began to consider him to be equal to Garuda. 75.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)