श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 1: हनुमान् जी के द्वारा समुद्र का लङ्घन, मैनाक के द्वारा उनका स्वागत, सुरसा पर उनकी विजय तथा सिंहिका का वध,लंका की शोभा देखना  »  श्लोक 71
 
 
श्लोक  5.1.71 
विकर्षन्नूर्मिजालानि बृहन्ति लवणाम्भसि।
पुप्लुवे कपिशार्दूलो विकिरन्निव रोदसी॥ ७१॥
 
 
अनुवाद
कपिकेसरी अपने प्रचण्ड वेग से अत्यन्त ऊँची लहरों को आकर्षित करता हुआ समुद्र में उड़ रहा था, मानो वह पृथ्वी और आकाश दोनों को क्षुब्ध कर रहा हो ॥ 71॥
 
With his tremendous speed the Kapikesari was flying in the ocean, attracting very high waves, as if he was disturbing both the earth and the sky. ॥ 71॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)