श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 1: हनुमान् जी के द्वारा समुद्र का लङ्घन, मैनाक के द्वारा उनका स्वागत, सुरसा पर उनकी विजय तथा सिंहिका का वध,लंका की शोभा देखना  »  श्लोक 56
 
 
श्लोक  5.1.56 
तस्याम्बरगतौ बाहू ददृशाते प्रसारितौ।
पर्वताग्राद् विनिष्क्रान्तौ पञ्चास्याविव पन्नगौ॥ ५६॥
 
 
अनुवाद
आकाश में फैली हुई उनकी दोनों भुजाएँ ऐसी प्रतीत हो रही थीं मानो पाँच-पाँच फनों वाले दो सर्प पर्वत की चोटी से निकल रहे हों ॥56॥
 
His two arms stretched out in the sky looked as if two serpents with five hoods each were emerging from the peak of a mountain. ॥ 56॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)