श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 1: हनुमान् जी के द्वारा समुद्र का लङ्घन, मैनाक के द्वारा उनका स्वागत, सुरसा पर उनकी विजय तथा सिंहिका का वध,लंका की शोभा देखना  »  श्लोक 43-44
 
 
श्लोक  5.1.43-44 
एवमुक्त्वा तु हनुमान् वानरो वानरोत्तम:॥ ४३॥
उत्पपाताथ वेगेन वेगवानविचारयन्।
सुपर्णमिव चात्मानं मेने स कपिकुञ्जर:॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
ऐसा कहकर महाबली वानरनायक श्री हनुमानजी बिना किसी विघ्न-बाधा की चिंता किए बड़े वेग से ऊपर की ओर उछल पड़े। उस समय महाबली वानरनायक ने स्वयं को गरुड़ समझ लिया।
 
Saying this, the mighty monkey leader Shri Hanuman ji jumped upwards with great speed without thinking of the obstacles. At that time, the greatest monkey leader thought of himself as Garuda himself.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)