श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 1: हनुमान् जी के द्वारा समुद्र का लङ्घन, मैनाक के द्वारा उनका स्वागत, सुरसा पर उनकी विजय तथा सिंहिका का वध,लंका की शोभा देखना  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  5.1.35 
बाहू संस्तम्भयामास महापरिघसंनिभौ।
आससाद कपि: कटॺां चरणौ संचुकोच च॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
उन्होंने अपनी परिघ के समान विशाल भुजाएँ पर्वत पर स्थापित कर दीं, फिर अपने सब अंगों को इस प्रकार सिकोड़ लिया कि वे कमर की सीमा में आ गए, साथ ही अपने पैरों को भी मोड़ लिया॥35॥
 
He placed his huge arms, like a Parigha, on the mountain. Then he shrank all his upper limbs in such a way that they came within the boundary of the waist; along with that he folded his legs also.॥ 35॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)