श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 1: हनुमान् जी के द्वारा समुद्र का लङ्घन, मैनाक के द्वारा उनका स्वागत, सुरसा पर उनकी विजय तथा सिंहिका का वध,लंका की शोभा देखना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  5.1.3 
अथ वैदूर्यवर्णेषु शाद्वलेषु महाबल:।
धीर: सलिलकल्पेषु विचचार यथासुखम्॥ ३॥
 
 
अनुवाद
तब धैर्यवान स्वभाव वाले वे महाबली पवनराज वैदूर्य मणि (नीलम) के समान हरी घास और समुद्र के जल पर सुखपूर्वक विचरण करने लगे॥3॥
 
Then that mighty wind prince with a patient nature started roaming happily on the green grass like Vaidurya gem (sapphire) and the water of the sea. 3॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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