श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 1: हनुमान् जी के द्वारा समुद्र का लङ्घन, मैनाक के द्वारा उनका स्वागत, सुरसा पर उनकी विजय तथा सिंहिका का वध,लंका की शोभा देखना  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  5.1.29 
एष पर्वतसंकाशो हनुमान् मारुतात्मज:।
तितीर्षति महावेग: समुद्रं वरुणालयम्॥ २९॥
 
 
अनुवाद
अहा! पर्वत के समान विशाल और महान वेग वाले पवनपुत्र हनुमानजी वरुणालय सागर को पार करना चाहते हैं॥29॥
 
Aha! Hanumanji, the son of the wind who is as huge as a mountain and has great speed, wants to cross the Varunalaya ocean. 29॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)