श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 1: हनुमान् जी के द्वारा समुद्र का लङ्घन, मैनाक के द्वारा उनका स्वागत, सुरसा पर उनकी विजय तथा सिंहिका का वध,लंका की शोभा देखना  »  श्लोक 191
 
 
श्लोक  5.1.191 
स तां बुद्‍ध्वार्थतत्त्वेन सिंहिकां मतिमान् कपि:।
व्यवर्धत महाकाय: प्रावृषीव बलाहक:॥ १९१॥
 
 
अनुवाद
तब बुद्धिमान नकलची हनुमान्‌जी ने निश्चय करके कि यह सिंहिका ही है, वर्षा ऋतु में मेघ के समान अपना शरीर फैलाना आरम्भ कर दिया। इस प्रकार वे विशालकाय हो गए ॥191॥
 
Then the intelligent copycat Hanuman ji, having decided that this was actually Simhika, started expanding his body like a cloud during the rainy season. In this way he became a giant. 191॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)