श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 1: हनुमान् जी के द्वारा समुद्र का लङ्घन, मैनाक के द्वारा उनका स्वागत, सुरसा पर उनकी विजय तथा सिंहिका का वध,लंका की शोभा देखना  »  श्लोक 184-185h
 
 
श्लोक  5.1.184-185h 
प्लवमानं तु तं दृष्ट्वा सिंहिका नाम राक्षसी॥ १८४॥
मनसा चिन्तयामास प्रवृद्धा कामरूपिणी।
 
 
अनुवाद
इस प्रकार जाते समय हनुमान जी को सिंहिका नामक एक विशालकाय राक्षसी दिखाई दी जो इच्छानुसार कोई भी रूप धारण कर सकती थी। यह देखकर वह मन में इस प्रकार विचार करने लगी - 184 1/2॥
 
While leaving in this way, Hanuman ji was seen by a giant demon named Sinhika who could take any form as per his wish. Seeing this, she started thinking in her mind like this - 184 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)