श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 1: हनुमान् जी के द्वारा समुद्र का लङ्घन, मैनाक के द्वारा उनका स्वागत, सुरसा पर उनकी विजय तथा सिंहिका का वध,लंका की शोभा देखना  »  श्लोक 158-159h
 
 
श्लोक  5.1.158-159h 
निविश्य वदनं मेऽद्य गन्तव्यं वानरोत्तम।
वर एष पुरा दत्तो मम धात्रेति सत्वरा॥ १५८॥
व्यादाय विपुलं वक्त्रं स्थिता सा मारुते:पुर:।
 
 
अनुवाद
वानरों में श्रेष्ठ! आज तुम मेरे मुख में प्रवेश करके ही आगे बढ़ो। पूर्वकाल में विधाता ने मुझे ऐसा ही वरदान दिया था।' ऐसा कहकर सुरसा तुरन्त अपना विशाल मुख खोले हुए हनुमान के सामने खड़ी हो गई।
 
Best of the monkeys! Today you must go ahead only after entering my mouth. In the past the Creator had given me such a boon.' Saying this Surasa immediately stood before Hanuman with her huge mouth wide open. 158 1/2
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)