श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 1: हनुमान् जी के द्वारा समुद्र का लङ्घन, मैनाक के द्वारा उनका स्वागत, सुरसा पर उनकी विजय तथा सिंहिका का वध,लंका की शोभा देखना  »  श्लोक 152
 
 
श्लोक  5.1.152 
एवमुक्त: सुरसया प्रहृष्टवदनोऽब्रवीत्।
रामो दाशरथिर्नाम प्रविष्टो दण्डकावनम्।
लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा वैदेह्या चापि भार्यया॥ १५२॥
 
 
अनुवाद
सुरसा के ऐसा कहने पर हनुमानजी प्रसन्न होकर बोले- 'देवि! दशरथनन्दन श्रीरामचन्द्रजी अपने भाई लक्ष्मण और पत्नी सीताजी के साथ दण्डकारण्य आये थे। 152॥
 
When Surasa said this, Hanuman ji said with joy - 'Devi! Dashrathanandan Shriramchandraji had come to Dandakaranya with his brother Lakshman and his wife Sitaji. 152॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)