श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 1: हनुमान् जी के द्वारा समुद्र का लङ्घन, मैनाक के द्वारा उनका स्वागत, सुरसा पर उनकी विजय तथा सिंहिका का वध,लंका की शोभा देखना  »  श्लोक 139
 
 
श्लोक  5.1.139 
हिरण्यनाभ शैलेन्द्र परितुष्टोऽस्मि ते भृशम्।
अभयं ते प्रयच्छामि गच्छ सौम्य यथासुखम्॥ १३९॥
 
 
अनुवाद
'स्वर्णमय शैलराज मैनाक! मैं तुम पर अत्यन्त प्रसन्न हूँ। हे कोमल! मैं तुम्हें अभयदान देता हूँ। तुम जहाँ चाहो, सुखपूर्वक जा सकते हो॥ 139॥
 
‘Golden Shailraj Mainak! I am very pleased with you. Gentle one! I grant you protection. You can go wherever you wish happily.॥ 139॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)