श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 1: हनुमान् जी के द्वारा समुद्र का लङ्घन, मैनाक के द्वारा उनका स्वागत, सुरसा पर उनकी विजय तथा सिंहिका का वध,लंका की शोभा देखना  »  श्लोक 138
 
 
श्लोक  5.1.138 
उवाच वचनं धीमान् परितोषात् सगद‍्गदम्।
सुनाभं पर्वतश्रेष्ठं स्वयमेव शचीपति:॥ १३८॥
 
 
अनुवाद
उस समय बुद्धिमान् इन्द्रदेव स्वयं अत्यन्त संतुष्ट हो गए और पर्वतश्रेष्ठ सुनाभ मैनाक से गर्वयुक्त वाणी में बोले-॥138॥
 
At that time, the wise Lord Indra himself became extremely satisfied and said in a proud voice to the mountain best Sunabha Mainaka -॥ 138॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)