श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 1: हनुमान् जी के द्वारा समुद्र का लङ्घन, मैनाक के द्वारा उनका स्वागत, सुरसा पर उनकी विजय तथा सिंहिका का वध,लंका की शोभा देखना  »  श्लोक 135
 
 
श्लोक  5.1.135 
भूयश्चोर्ध्वं गतिं प्राप्य गिरिं तमवलोकयन्।
वायुसूनुर्निरालम्बो जगाम कपिकुञ्जर:॥ १३५॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् और भी ऊपर उठकर उस पर्वत की ओर देखते हुए श्रेष्ठ पवनपुत्र हनुमान्‌जी बिना किसी सहारे के आगे बढ़ने लगे॥135॥
 
After that, rising even higher and looking at that mountain, Hanumanji, the son of the best wind, started moving forward without any support. 135॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)