श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 1: हनुमान् जी के द्वारा समुद्र का लङ्घन, मैनाक के द्वारा उनका स्वागत, सुरसा पर उनकी विजय तथा सिंहिका का वध,लंका की शोभा देखना  »  श्लोक 132
 
 
श्लोक  5.1.132 
इत्युक्त्वा पाणिना शैलमालभ्य हरिपुङ्गव:।
जगामाकाशमाविश्य वीर्यवान् प्रहसन्निव॥ १३२॥
 
 
अनुवाद
ऐसा कहकर वानरराज हनुमानजी ने मुस्कुराते हुए मैनाक को हाथ से स्पर्श किया और आकाश में ऊपर उठकर चलने लगे।
 
Saying this the mighty Hanuman, the chief of the monkeys, smilingly touched Mainaka with his hand and rose up in the sky and began to walk. 132.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)