श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 1: हनुमान् जी के द्वारा समुद्र का लङ्घन, मैनाक के द्वारा उनका स्वागत, सुरसा पर उनकी विजय तथा सिंहिका का वध,लंका की शोभा देखना  »  श्लोक 131
 
 
श्लोक  5.1.131 
त्वरते कार्यकालो मे अहश्चाप्यतिवर्तते।
प्रतिज्ञा च मया दत्ता न स्थातव्यमिहान्तरा॥ १३१॥
 
 
अनुवाद
मेरे काम का समय मुझे उसे शीघ्रतापूर्वक पूरा करने के लिए विवश कर रहा है। यह दिन भी बीतता जा रहा है। मैंने वानरों से प्रतिज्ञा की है कि मैं बीच में यहाँ नहीं रुक सकता।॥131॥
 
‘The time for my work is forcing me to complete it very quickly. This day is also passing by. I have made a promise to the monkeys that I cannot stop here in between.'॥ 131॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)