श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 1: हनुमान् जी के द्वारा समुद्र का लङ्घन, मैनाक के द्वारा उनका स्वागत, सुरसा पर उनकी विजय तथा सिंहिका का वध,लंका की शोभा देखना  »  श्लोक 128
 
 
श्लोक  5.1.128 
अस्मिन् नेवंगते कार्ये सागरस्य ममैव च।
प्रीतिं प्रीतमना: कर्तुं त्वमर्हसि महामते॥ १२८॥
 
 
अनुवाद
महामते! बहुत दिनों के बाद आपको अपने पिता के उपकार का बदला चुकाने का अवसर मिला है। आप प्रसन्न होकर मुझे तथा समुद्र को भी संतुष्ट करें (हमारा आतिथ्य स्वीकार करके हमें प्रसन्न करें)॥128॥
 
Mahamate! After a long time you have got this opportunity to repay your father's kindness. Be happy and satisfy me as well as the ocean (please us by accepting our hospitality).॥ 128॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)