श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 1: हनुमान् जी के द्वारा समुद्र का लङ्घन, मैनाक के द्वारा उनका स्वागत, सुरसा पर उनकी विजय तथा सिंहिका का वध,लंका की शोभा देखना  »  श्लोक 125
 
 
श्लोक  5.1.125 
स मामुपगत: क्रुद्धो वज्रमुद्यम्य देवराट्।
ततोऽहं सहसा क्षिप्त: श्वसनेन महात्मना॥ १२५॥
 
 
अनुवाद
उस समय क्रोधित हुए देवराज इन्द्र अपना वज्र लेकर मेरी ओर आए, किन्तु सहसा ही महान वायु ने मुझे समुद्र में फेंक दिया॥125॥
 
At that time the enraged King of the Gods Indra came towards me holding his thunderbolt, but suddenly the great Vayu threw me into the ocean.॥ 125॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)