श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 1: हनुमान् जी के द्वारा समुद्र का लङ्घन, मैनाक के द्वारा उनका स्वागत, सुरसा पर उनकी विजय तथा सिंहिका का वध,लंका की शोभा देखना  »  श्लोक 120
 
 
श्लोक  5.1.120 
त्वं हि देववरिष्ठस्य मारुतस्य महात्मन:।
पुत्रस्तस्यैव वेगेन सदृश: कपिकुञ्जर॥ १२०॥
 
 
अनुवाद
हे महान कपिश्रेष्ठ! आप महान वायुदेव के पुत्र हैं और गति में भी उनके समान हैं॥120॥
 
O great Kapishreshtha! You are the son of the great Vayu, the supreme deity, and are equal to him in speed as well.॥ 120॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)