श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 1: हनुमान् जी के द्वारा समुद्र का लङ्घन, मैनाक के द्वारा उनका स्वागत, सुरसा पर उनकी विजय तथा सिंहिका का वध,लंका की शोभा देखना  »  श्लोक 113-114h
 
 
श्लोक  5.1.113-114h 
कृते च प्रतिकर्तव्यमेष धर्म: सनातन:॥ ११३॥
सोऽयं तत्प्रतिकारार्थी त्वत्त: सम्मानमर्हति।
 
 
अनुवाद
‘यदि किसी ने तुम्हारा उपकार किया है, तो तुम्हें भी उसके बदले में उसका उपकार करना चाहिए – यही सनातन धर्म है। इस दृष्टि से यह समुद्र जो उपकार करने की इच्छा रखता है, तुमसे आदर पाने का अधिकारी है (तुम उसका आदर स्वीकार करो, इससे ही उसका आदर होगा)॥113 1/2॥
 
‘If someone has done a favour to you, you should do a favour to him in return – this is the eternal Dharma. From this point of view, this ocean who desires to do a favour in return is worthy of receiving respect from you (you should accept his respect, by this alone he will be respected).॥ 113 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)