श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 1: हनुमान् जी के द्वारा समुद्र का लङ्घन, मैनाक के द्वारा उनका स्वागत, सुरसा पर उनकी विजय तथा सिंहिका का वध,लंका की शोभा देखना  »  श्लोक 108
 
 
श्लोक  5.1.108 
स तमुच्छ्रितमत्यर्थं महावेगो महाकपि:।
उरसा पातयामास जीमूतमिव मारुत:॥ १०८॥
 
 
अनुवाद
अतः जिस प्रकार वायु बादल को छिन्न-भिन्न कर देती है, उसी प्रकार अत्यन्त वेगवान वानर हनुमानजी ने ऊँचे मैनाक पर्वत की सबसे ऊँची चोटी को अपनी छाती से धक्का देकर गिरा दिया।
 
Therefore, just as the wind breaks up a cloud, similarly the extremely swift ape Hanuman brought down the highest peak of the tall Mainak mountain by pushing it with his chest.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)