श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 1: हनुमान् जी के द्वारा समुद्र का लङ्घन, मैनाक के द्वारा उनका स्वागत, सुरसा पर उनकी विजय तथा सिंहिका का वध,लंका की शोभा देखना  »  श्लोक 107
 
 
श्लोक  5.1.107 
समुत्थितमसङ्गेन हनूमानग्रत: स्थितम्।
मध्ये लवणतोयस्य विघ्नोऽयमिति निश्चित:॥ १०७॥
 
 
अनुवाद
नमक के समुद्र के बीच में मैनाक को अपने सामने खड़ा देखकर हनुमान ने मन में निश्चय किया कि कोई न कोई मुसीबत आ ही गई है।
 
Seeing Mainaka standing before him in the middle of the sea of ​​salt, Hanuman decided in his mind that some trouble had occurred.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)