श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 1: हनुमान् जी के द्वारा समुद्र का लङ्घन, मैनाक के द्वारा उनका स्वागत, सुरसा पर उनकी विजय तथा सिंहिका का वध,लंका की शोभा देखना  »  श्लोक 105
 
 
श्लोक  5.1.105 
तस्य जाम्बूनदै: शृङ्गै: पर्वतस्य समुत्थितै:।
आकाशं शस्त्रसंकाशमभवत् काञ्चनप्रभम्॥ १०५॥
 
 
अनुवाद
उस पर्वतके उठे हुए स्वर्ण शिखरोंके कारण नीलवर्णका आकाश अस्त्रके समान सुवर्णमय कांतिसे चमकने लगा ॥105॥
 
Because of the raised golden peaks of that mountain, the blue coloured sky like a weapon began to glow with a golden radiance. ॥105॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)