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श्लोक 4.9.23-24h  |
मदीयान् मन्त्रिणो बद्ध्वा परुषं वाक्यमब्रवीत्।
निग्रहे च समर्थस्य तं पापं प्रति राघव॥ २३॥
न प्रावर्तत मे बुद्धिर्भ्रातृगौरवयन्त्रिता। |
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| अनुवाद |
| ‘उसने मेरे मन्त्रियों को बन्दी बनाकर उन्हें कठोर फटकार लगाई। रघुवीर! यद्यपि मैं स्वयं उस पापी को बन्दी बनाने में समर्थ था, तथापि अपने भाई के प्रति गुरु-भाव के कारण मेरे मन में ऐसा विचार नहीं आया।॥23 1/2॥ |
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| ‘He imprisoned my ministers and reprimanded them harshly. Raghuveer! Although I myself was capable of imprisoning that sinner, yet due to the feeling of guru towards my brother, such a thought did not come to my mind.॥ 23 1/2॥ |
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