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ramayan 4.8.7: ‘सत्प्रवृत्तिवाले मित्र अपने घर में रखे हुए सोने, चाँदी और उत्तम आभूषणों को अपने अच्छे मित्रों के लिए अविभाजित समझते हैं – वे अपने धन पर उन मित्रों को अपने समान ही अधिकार रखते हैं॥ 7॥   |   ramayan सर्ग 4.8: सुग्रीव का श्रीराम से अपना दुःख निवेदन करना और श्रीराम का उन्हें आश्वासन देते हुए दोनों भाइयों में वैर होने का कारण पूछना   ।   ramayan काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 8: सुग्रीव का श्रीराम से अपना दुःख निवेदन करना और श्रीराम का उन्हें आश्वासन देते हुए दोनों भाइयों में वैर होने का कारण पूछना  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  4.8.7 
रजतं वा सुवर्णं वा शुभान्याभरणानि च।
अविभक्तानि साधूनामवगच्छन्ति साधव:॥ ७॥
 
 
अनुवाद
‘सत्प्रवृत्तिवाले मित्र अपने घर में रखे हुए सोने, चाँदी और उत्तम आभूषणों को अपने अच्छे मित्रों के लिए अविभाजित समझते हैं – वे अपने धन पर उन मित्रों को अपने समान ही अधिकार रखते हैं॥ 7॥
 
‘Friends with a good nature consider the gold, silver, and fine ornaments in their homes to be undivided for their good friends – they consider those friends to have an equal right over their wealth as themselves.॥ 7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)