Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
ramayan 4.67.7: जम्भाई लेते समय बुद्धिमान हनुमानजी का तेजस्वी मुख जलती हुई नरकंकाल और धूमरहित अग्नि के समान प्रतीत हो रहा था॥7॥   |   ramayan सर्ग 4.67: हनुमान जी का समुद्र लाँघने के लिये उत्साह प्रकट करना, जाम्बवान् के द्वारा उनकी प्रशंसा तथा वेगपूर्वक छलाँग मारने के लिये हनुमान जी का महेन्द्र पर्वत पर चढ़ना   ।   ramayan काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 67: हनुमान जी का समुद्र लाँघने के लिये उत्साह प्रकट करना, जाम्बवान् के द्वारा उनकी प्रशंसा तथा वेगपूर्वक छलाँग मारने के लिये हनुमान जी का महेन्द्र पर्वत पर चढ़ना  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  4.67.7 
अशोभत मुखं तस्य जृम्भमाणस्य धीमत:।
अम्बरीषोपमं दीप्तं विधूम इव पावक:॥ ७॥
 
 
अनुवाद
जम्भाई लेते समय बुद्धिमान हनुमानजी का तेजस्वी मुख जलती हुई नरकंकाल और धूमरहित अग्नि के समान प्रतीत हो रहा था॥7॥
 
While yawning, the radiant face of wise Hanumanji looked like a burning hell and smokeless fire. 7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)