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ramayan 4.67.48: भयभीत होकर ऋषि-मुनि भी उस पर्वत को छोड़कर जाने लगे। जैसे विशाल दुर्गम वन में अपने साथियों से बिछुड़कर कोई पथिक महान विपत्ति में फंस जाता है, वही दशा उस महान पर्वत महेंद्र की हो रही थी।   |   ramayan सर्ग 4.67: हनुमान जी का समुद्र लाँघने के लिये उत्साह प्रकट करना, जाम्बवान् के द्वारा उनकी प्रशंसा तथा वेगपूर्वक छलाँग मारने के लिये हनुमान जी का महेन्द्र पर्वत पर चढ़ना   ।   ramayan काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 67: हनुमान जी का समुद्र लाँघने के लिये उत्साह प्रकट करना, जाम्बवान् के द्वारा उनकी प्रशंसा तथा वेगपूर्वक छलाँग मारने के लिये हनुमान जी का महेन्द्र पर्वत पर चढ़ना  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  4.67.48 
ऋषिभिस्त्राससम्भ्रान्तैस्त्यज्यमान: शिलोच्चय:।
सीदन् महति कान्तारे सार्थहीन इवाध्वग:॥ ४८॥
 
 
अनुवाद
भयभीत होकर ऋषि-मुनि भी उस पर्वत को छोड़कर जाने लगे। जैसे विशाल दुर्गम वन में अपने साथियों से बिछुड़कर कोई पथिक महान विपत्ति में फंस जाता है, वही दशा उस महान पर्वत महेंद्र की हो रही थी।
 
Frightened, the sages and saints also started leaving that mountain. Just as a traveller who is separated from his companions in a huge inaccessible forest gets trapped in a great calamity, the same condition was happening to that great mountain Mahendra. 48.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)