श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 67: हनुमान जी का समुद्र लाँघने के लिये उत्साह प्रकट करना, जाम्बवान् के द्वारा उनकी प्रशंसा तथा वेगपूर्वक छलाँग मारने के लिये हनुमान जी का महेन्द्र पर्वत पर चढ़ना  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  4.67.41 
सिंहशार्दूलसहितं मत्तमातङ्गसेवितम्।
मत्तद्विजगणोद‍्घुष्टं सलिलोत्पीडसंकुलम्॥ ४१॥
 
 
अनुवाद
महेन्द्र पर्वत के वनों में सिंह और व्याघ्र भी रहते थे, मदमस्त हाथी विचरण करते थे, मतवाले पक्षियों के समूह निरन्तर कलरव करते रहते थे और वह पर्वत जल के स्रोतों और झरनों से भरा हुआ प्रतीत होता था॥ 41॥
 
Lions and tigers also lived in the forests of the Mahendra mountain, intoxicated elephants roamed about, flocks of inebriated birds chirped constantly and the mountain appeared to be dotted with water sources and springs.॥ 41॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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