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ramayan 4.67.39: ऐसा कहकर पवनपुत्र हनुमान्‌जी शत्रुओं का संहार करने में वायु के समान पराक्रमी होकर पर्वतों में श्रेष्ठ महेन्द्र पर चढ़ गये।   |   ramayan सर्ग 4.67: हनुमान जी का समुद्र लाँघने के लिये उत्साह प्रकट करना, जाम्बवान् के द्वारा उनकी प्रशंसा तथा वेगपूर्वक छलाँग मारने के लिये हनुमान जी का महेन्द्र पर्वत पर चढ़ना   ।   ramayan काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 67: हनुमान जी का समुद्र लाँघने के लिये उत्साह प्रकट करना, जाम्बवान् के द्वारा उनकी प्रशंसा तथा वेगपूर्वक छलाँग मारने के लिये हनुमान जी का महेन्द्र पर्वत पर चढ़ना  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  4.67.39 
ततस्तु मारुतप्रख्य: स हरिर्मारुतात्मज:।
आरुरोह नगश्रेष्ठं महेन्द्रमरिमर्दन:॥ ३९॥
 
 
अनुवाद
ऐसा कहकर पवनपुत्र हनुमान्‌जी शत्रुओं का संहार करने में वायु के समान पराक्रमी होकर पर्वतों में श्रेष्ठ महेन्द्र पर चढ़ गये।
 
Saying this, Hanuman, the son of the wind and mighty as the wind to kill the enemies, climbed upon Mahendra, the best among the mountains.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)