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श्लोक 4.67.38-39h  |
एतानि मम वेगं हि शिखराणि महान्ति च॥ ३८॥
प्लवतो धारयिष्यन्ति योजनानामित: शतम्। |
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| अनुवाद |
| जब मैं यहाँ से सौ योजन तक छलांग लगाऊँगा, तब महेन्द्र पर्वत के ये महान शिखर ही मेरे वेग को सहन कर सकेंगे।’ ॥38 1/2॥ |
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| When I leap for a hundred yojanas from here, only these great peaks of the Mahendra mountain will be able to bear my speed.' ॥ 38 1/2॥ |
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