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ramayan 4.67.38-39h: जब मैं यहाँ से सौ योजन तक छलांग लगाऊँगा, तब महेन्द्र पर्वत के ये महान शिखर ही मेरे वेग को सहन कर सकेंगे।’ ॥38 1/2॥   |   ramayan सर्ग 4.67: हनुमान जी का समुद्र लाँघने के लिये उत्साह प्रकट करना, जाम्बवान् के द्वारा उनकी प्रशंसा तथा वेगपूर्वक छलाँग मारने के लिये हनुमान जी का महेन्द्र पर्वत पर चढ़ना   ।   ramayan काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 67: हनुमान जी का समुद्र लाँघने के लिये उत्साह प्रकट करना, जाम्बवान् के द्वारा उनकी प्रशंसा तथा वेगपूर्वक छलाँग मारने के लिये हनुमान जी का महेन्द्र पर्वत पर चढ़ना  »  श्लोक 38-39h
 
 
श्लोक  4.67.38-39h 
एतानि मम वेगं हि शिखराणि महान्ति च॥ ३८॥
प्लवतो धारयिष्यन्ति योजनानामित: शतम्।
 
 
अनुवाद
जब मैं यहाँ से सौ योजन तक छलांग लगाऊँगा, तब महेन्द्र पर्वत के ये महान शिखर ही मेरे वेग को सहन कर सकेंगे।’ ॥38 1/2॥
 
When I leap for a hundred yojanas from here, only these great peaks of the Mahendra mountain will be able to bear my speed.' ॥ 38 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)