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ramayan 4.67.28-29h: मैं वज्रधारी इन्द्र या स्वयंभू ब्रह्मा के हाथ से अमृत छीनकर अचानक यहाँ ला सकता हूँ। यहाँ तक कि सम्पूर्ण लंका को भी भूमि से उखाड़कर अपने हाथ में ले जा सकता हूँ। ऐसा मेरा विश्वास है।॥28 1/2॥   |   ramayan सर्ग 4.67: हनुमान जी का समुद्र लाँघने के लिये उत्साह प्रकट करना, जाम्बवान् के द्वारा उनकी प्रशंसा तथा वेगपूर्वक छलाँग मारने के लिये हनुमान जी का महेन्द्र पर्वत पर चढ़ना   ।   ramayan काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 67: हनुमान जी का समुद्र लाँघने के लिये उत्साह प्रकट करना, जाम्बवान् के द्वारा उनकी प्रशंसा तथा वेगपूर्वक छलाँग मारने के लिये हनुमान जी का महेन्द्र पर्वत पर चढ़ना  »  श्लोक 28-29h
 
 
श्लोक  4.67.28-29h 
वासवस्य सवज्रस्य ब्रह्मणो वा स्वयम्भुव:।
विक्रम्य सहसा हस्तादमृतं तदिहानये॥ २८॥
लङ्कां वापि समुत्क्षिप्य गच्छेयमिति मे मति:।
 
 
अनुवाद
मैं वज्रधारी इन्द्र या स्वयंभू ब्रह्मा के हाथ से अमृत छीनकर अचानक यहाँ ला सकता हूँ। यहाँ तक कि सम्पूर्ण लंका को भी भूमि से उखाड़कर अपने हाथ में ले जा सकता हूँ। ऐसा मेरा विश्वास है।॥28 1/2॥
 
‘I can snatch the nectar from the hands of thunderbolt-wielding Indra or self-manifested Brahma and bring it here suddenly. I can even uproot the entire Lanka from the ground and carry it in my hands. I have this confidence.’॥28 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)