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श्लोक 4.67.24  |
निमेषान्तरमात्रेण निरालम्बनमम्बरम्।
सहसा निपतिष्यामि घनाद् विद्युदिवोत्थिता॥ २४॥ |
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| अनुवाद |
| जैसे बादल से बिजली चमकती है, वैसे ही मैं पलक झपकते ही बिना किसी सहारे के अचानक आकाश में उड़ जाऊँगा॥ 24॥ |
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| ‘Like lightning arising from a cloud, in the blink of an eye I shall suddenly fly away into the sky, without any support.॥ 24॥ |
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