श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 67: हनुमान जी का समुद्र लाँघने के लिये उत्साह प्रकट करना, जाम्बवान् के द्वारा उनकी प्रशंसा तथा वेगपूर्वक छलाँग मारने के लिये हनुमान जी का महेन्द्र पर्वत पर चढ़ना  »  श्लोक 20-21h
 
 
श्लोक  4.67.20-21h 
भविष्यति हि मे पन्था: स्वाते: पन्था इवाम्बरे।
चरन्तं घोरमाकाशमुत्पतिष्यन्तमेव च॥ २०॥
द्रक्ष्यन्ति निपतन्तं च सर्वभूतानि वानरा:।
 
 
अनुवाद
'विस्तृत रूप से बिखरे हुए अनेक पुष्पों के कारण मेरा मार्ग आकाश में अनेक नक्षत्रों से सुशोभित स्वातिमार्ग के समान प्रतीत होगा। हे वानरों! आज समस्त प्राणी मुझे भयानक आकाश में उछलते-कूदते हुए सीधे जाते हुए देखेंगे।॥ 20 1/2॥
 
‘Because of the many flowers scattered about, my path will appear like the Swatimarg (shadow path) adorned with many constellations in the sky. O monkeys! Today all creatures will see me going straight in the terrifying sky, jumping up and down.॥ 20 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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