श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 67: हनुमान जी का समुद्र लाँघने के लिये उत्साह प्रकट करना, जाम्बवान् के द्वारा उनकी प्रशंसा तथा वेगपूर्वक छलाँग मारने के लिये हनुमान जी का महेन्द्र पर्वत पर चढ़ना  »  श्लोक 17-18
 
 
श्लोक  4.67.17-18 
उत्सहेयमतिक्रान्तुं सर्वानाकाशगोचरान्।
सागरान् शोषयिष्यामि दारयिष्यामि मेदिनीम्॥ १७॥
पर्वतांश्चूर्णयिष्यामि प्लवमान: प्लवङ्गम:।
हरिष्याम्युरुवेगेन प्लवमानो महार्णवम्॥ १८॥
 
 
अनुवाद
'मुझमें सभी नक्षत्रों, ग्रहों आदि को पार करके आगे बढ़ने का उत्साह है। मैं चाहूँ तो समुद्रों को सोख सकता हूँ, पृथ्वी को चीर सकता हूँ और उछल-कूद करके पहाड़ों को टुकड़े-टुकड़े कर सकता हूँ; क्योंकि मैं लंबी छलांग लगाने वाला बंदर हूँ। मैं बड़े वेग से समुद्र पार करके अवश्य पहुँचूँगा।'
 
‘I have the enthusiasm to go ahead by crossing all the stars and planets etc. If I want, I can soak up the oceans, tear apart the earth and break the mountains into pieces by jumping; because I am a monkey who can take long leaps. Jumping across the ocean with great speed, I will definitely reach across it.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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